मेरे हाथों की लकीरों में
ये ऐब है मुहसिन
मैं जिस शक़्स को छू लू
वो मेरा नहीं रहता ।।

उस शक़्स से फ़क़त
इतना सा ताल्लुक़ है
वो परेशान हो तो
मुझे नींद नहीं आती।।

तेरा मिलना ही
मुक्कदर में नहीं था ज़ालिम
वरना क्या कुछ नहीं खोया
तुझे पाने के लिए।।

वक़्त ही वफ़ा ना कर सका
जो लम्हें उसे ज़िन्दगी के दिए
ताह उम्र अफ़सोस है
ज़ख्म मेरे थे तो उसकी सुई से कियूं दिए।।

खाक में मिल गया है
तब से मेरा वजूद
जब से उसने मुझे
लफ्ज़ो से गिरा दिया
बेशक़ रोज चाँद से तोलता है
सुनता नहीं अब चाहें कान के पास बोलता है।।

मैंने वादा लिया था उससे
अपने जनाज़े पे बुलाने का
बस उसे निभाने को रोज़
उसके जिंदा होने की दुआ करती हूँ
उठा के हाथ अपने साथ
बस यही वफ़ा करती हूँ।।

बड़ी गज़ब सी फ़ितरत
पाई है मर्दों ने
वो ताकना चाहता है
औरत को लिबास के नीचे से
पर बेग़म अपनी के पर्दानशीं होने का
फ़र्क करता है।।

मेरी चुन्नरी में सुराख़ थे
तोहमतों के
सिर ढकने को उसका
किनारा ढूँढती हूँ
ख़ुद तो हूँ चलने में नक़ाब
उस पर
अपाहिजों से सहारा ढूंढ़ती हूँ।।


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