पापा तेरे जाने के बाद

कानों में गूँजती है इक बेशब्द आवाज़
मुझे कोई बुला रहा है
नज़रें ढूंढ रही हैं तुझको
नहीं मिलेगा तेरा प्यार मुझको
वक़्त कड़वी हक़ीक़त बता रहा है
फिर भी......
वहम है तू मुझे बुला रहा है

छोड़ गई थी इस जमीं पर
लौट आई हूँ फिर वहीँ पर
पुकारता है दिल तू कहाँ है
क्या मेरा खो गया है
कौन हँस के मुझे जता रहा है
फिर भी.....
वहम है तू मुझे बुला रहा है

तेरी छावं बग़ैर तप रही है ज़िंदगी
जाने अब कैसे कट रही है ज़िंदगी
झुरमुट रिश्तों का घेर मुझे सता रहा है
फिर भी.....
वहम है तू मुझे बुला रहा है

लगता है तू कहीं है आस पास
नज़रों की नहीं होता एहसास
सच, सपने को झुठला रहा है
फिर भी.......
वहम है तू मुझे बुला रहा है।।


अजीत सतनाम कौर
अक्टूबर 2008

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