कियूँ छोड़ा मुझे
हर किसी ने
जरूर मुझमें कुछ
खामियां होंगी
मैं ही नहीं बना था
किसी के लिए
नसीब में मेरे ही
तन्हाईयां होंगी।।

मैं ढूँढती रही ज़िंदगी को
ज़िंदगी में ही
बसता है वो तो हर साँस में
मैं खोजती रही
बन्दगी में ही
मौज़ूद है वो क़ायनात में
मैंने ढूंढा सिर्फ
ज़मी में ही।।

बस उसने कहा था
इंतज़ार रखना
बेशक़ थे ज़िंदगी में
अमावस के अँधेरे
डाल के अश्कों का तेल
मैंने नैनो के दिये
जलाए रखे।।

हर रात सेज पर
ज़िंदगी की थकान से चूर
मैं सकून ढूँढती रही
आ तू यहीं
आरामगाह है ये मेरी
और आख़िरी नींद है मेरी
मुझे आख़िरी नींद सोना है
वादा था उससे मिलने का
इसी पते पे मुझे
दिलबर से रूबरू होना है।।

जिस रास्ते पर
खड़ी थी ज़िंदगी
मैं कतरा गई उधर जाने से
मुरझा गई उसे जीने में
अब तो खिलूँगी
मौत के आने से।।

हर शै में है
कहाँ नहीं है तू
सोचती हूँ
यहीं है वहाँ नहीं है तू
है कौन सी जगाह
जहाँ नहीं है तू
सच है या वहम
जहाँ मैं हूँ वहाँ नहीं है तू।।



आजीत सतनाम कौर

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