आज इस मंजर पर
मेरे दिल ने क्या कहा,
चाहा सभी को पर
क्यूँ ख़ुद को ना चाहा,
माँ में थी मेरी दुनिया
उसके पल्लू के संग रहना
मिलती थी मुझे ठंडी छांव
हर सुख दिया मेरे बाप ने
मेरा शहर या उनका गांव
सुखी थी मैं उसके राज में
उसकी ताक़त महसूस
करती थी अपने आप में

माँ ने टोका
हर वो काम करने को
जिसमें मेरी चंचलता थी
हर घड़ी अहसास कराया मेरे यौवन का,
मेरी बचपन को रंग दिया
अपने रंग में।
कुछ दर्द सा था मेरे अंदर  में

कैसे घर बदला
कियूँ माँ का छूटा
रस्में निबाही सब ने
मुझसे कुछ ना पूछा
पति की चौखट थी
मैं थी अब इसके दर पे
नया सफ़र था
अपना घर था
मेरी हस्ती थी
अब औलाद के दम पे

जी तो ली मैंने
एक लम्बी ज़िंदगी थी
माँ के घर से
माँ बनने तक
मैं ख़ुद के लिए
कब जी थी।।


अजीत सतनाम कौर



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