जिसे भी देखो वही नज़र आता है जख़्मी
नहीं किसी को आदत अब ज़ख्म छुपाने की

चाहें कर तंग या खूब सता ले
अब मुझे आदत हो गई है मुस्कुराने की

मैं बेटी हूँ, बहन हूँ और हूँ माँ भी
बन गई आदत अब दर्द खाने की

परदेस आ गई देश की मिटटी छोड़ कर
कैसी पड़ गईं रस्में रोज़ी कमाने की

क्या कहे 'अस्क' माँ के आँसू देख कर
कोई आस नहीं अब वापिस घर जाने की ।।


अजीत सतनाम कौर
सितम्बर 20

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