तह किये हुए कपड़ो जैसे
ये सजोंऐ हुए रिश्ते
आज फिर यूँ ही बैठ गई
छांटने
ढेर बहुत बड़ा था , 
उम्र के इस दौर में,
खाली समय भी
बहुत पड़ा था.....।

आज हर रिश्ता बहुत साफ था......।
किसे के पास हो कर भी दूर होने का अहसास था।
और किसी के दूर होने पर भी वो आस पास था।
..........
रिश्ते कुछ बहुत पुराने
और कुछ घिसे से ,
कुछ जैसे रिश्ते जर्जर से
वो रंग में भी अब बेरंग से,
माँ बाप के सम्बोधन से सजे जैसे
ये मिले थे रिश्ते मुझको जन्म से.....
कुछ ना पुराने, ना कुछ नए से
बीच की तह में पड़े से
अभी भी पूरी तरह नही हडेह से
रिश्ते थे कुछ सहेजे से,
बहन भाई के सम्बोधन से सजे जैसे
ये मिले थे रिश्ते मुझको बचपन से.......

ऊपर की तह में सजे थे रिश्ते कुछ नए से
खुशबू से लबालब भरे से
चमकदार और चटकीले रंगे से
ये रिश्ते ताज़े मोह के भरे से
प्यार से दिखते लदे से
मेरे बच्चों के संबोधन से सजे जैसे
ये मिले थे रिश्ते मुझको मेरे चयन से........

फिर भी, ना जाने क्यों?
इस ढेर से मैंने सबसे पुराने नीचे दबे हुए रिश्ते को ही खींचा
ये वे रिश्ते थे जिसने
मेरा जीवन था सींचा
हंकाकि इस रिश्ते में वक़्त की करीज़ के निशान भी
दिख रहे थे
पर इसी के जर्जर से रंग मुझे खींच रहे थे
मैंने ढेर को पलट कर
नीचे दबे रिश्ते को निकाल
अपने सीने से लगा लिया
आँखों से गर्म जैसे कोई जलजला निकला

सच ही है
मेरी सफ़ेद लट ने....
पिता का दुनिया से विदाई,
माँ के बुढ़ापे की दर्द तन्हाई
पुराने पेड़ की जड़ से
मजबूत रिश्ते
कपड़ो के ढेर से ये बढ़ते रिश्ते
कुछ नए और कुछ पुराने से रिश्ते
उम्र के सफ़र में टूटते और बनतें रिश्ते
मेरी ज़िंदगी के सफ़र के ऐ सानी रिश्ते ।।


अजीत सतनाम कौर
नवंबर 2019

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