आह निकली मेरी
उसके दर्द के कारण
अपने जख्मों को तो
मैंने कभी गिना ही नही।।

यूँ ही नहीं भीग गई
आँखे मेरी
लगता है कहीं कोई
बेटी रोई है।।

अपनी मजबूरी की
लक्ष्मण रेखा बना कर
मैंने उसे रोक दिया
दहलीज़ के उस पार
वो हाथ हिला के
चला गया पर
आज भी है मुझे
उसका इंतज़ार।।

मैं लगा कर
प्यार के पँख
खुल कर उड़ना चाहती थी
उसके प्यार की धार ने
मेरे पँख कुत्तर दिए।।

सोच लेना सफ़र बारे
चलने से पहले
कौन मिलेगा ?
जो वफ़ा निभा जाए
वो राह अभी मिली नहीं
कि तू चले और वफ़ा पाए।।

चलते चलते जब
मैं थक जाती हूँ
ज़िंदगी की डगर
और धुँधला जाती है
मेरी नज़र
तो कबरस्थान में
बैठ कर
मैं देखती हूँ अगला सफ़र।।

मेरी शोखियों को
वो क्या समझेगा
वो ये भी नहीं जानता है
मैंने अन्दर की
गुड़िया का हाथ
अभी छोड़ा नहीं है
बिछड़ गए सभी बारी बारी
बचपन ने साथ
अभी तोड़ा नहीं है।।



अजीत सतनाम कौर
जुलाई 2014

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