फूल मेरे जुड़े में सजाने वो आ गया
नए ख़्वाब मुझे अब दिखाने वो आ गया

दुःख जो उठाये थे ज़िंदगी भर मैंने
खुशियों की राह अब दिखाने वो आ गया

लाता है कौन आसमां से तारे तोड़ कर
राह में मेरी कहकशां बिछाने वो आ गया

सिसकती रही रोती रही हमेशा से मैं
अश्क़ मेरी आँखों से चुराने वो आ गया

अपनी ही चीखों से फटते थे कान मेरे
ख़ुशी के नगमें आज सुनाने वो आ गया

ना सुनाया ग़म का फ़साना
मैंने
ये बोझ भी मेरे दिल से हटाने वो आ गया।।


अजीत सतनाम कौर
2015

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