मस्त हवा के हवाले कर
अपने आप को
उड़ना चाहती थी मैं पँख फैला के
देखना चाहती थी आसमां को
इन्द्र धनुष के रंग सज़ा के

पर शीतल हवा से पहले ही
आँधी आ गई
तीख़ी नज़र एक बाज़ की
उस चिड़िया को खा गई

चिड़िया की हरजोई का
ना उसने कोई उत्तर दिया
हैवानित की चोंच से
उसके पँखो को कुत्तर दिया
अब मैं सहम गई हूँ

मैं डर गई हूँ
जीते जी मैं मर गई हूँ

अब मैं घोंसले से
कभी बाहर नहीं आती
कियूँ कि अब शीतल हवा नहीं गाती

अब ना रौशनी है
ना मौसम की गर्मी सर्दी है
सिर्फ़ पसरा है अँधेरा
और अंधेर गरधी है

ना रहे सुर
ना सजते अब साज़ है

चिड़ियाँ छुप गई घोंसलों में
बाहर उड़ते अब बाज़ है
सिर्फ़ बाज़ ही बाज़ है।।


अजीत सतनाम कौर
मार्च  2014

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