माँ के नाम
तेरी यादों के तवसूर में रहा करती है
तेरी बेटी तेरे दम से जीया करती है

ख़ुद काँपती रही सर्द हवाओं में वो
अपनी आग़ोश में बच्चे को लिया करती है

अपने सारे दुःखो को समेट झोली में
होंठ अपने सब्र से सिया करती है

अपने परिवार की छाया बन
सारे सुख उन पे वार दिया करती है

नहीं करते बदकिस्मत उसकी सेवा
कुदरत उन्हें कैसे बर्बाद किया करती है

है बेशक़ हजारों मील दूर मुझसे मगर
उसकी ममता मेरे अंदर जीया करती है

जब परदेस से उससे बात करूं
रो रो के मेरा नाम लिया करती है।।



अजीत सतनाम कौर
जून 2015

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