जानती हूँ कि भूला दोगे तुम
और कितनी बड़ी अब सज़ा दोगे तुम
हाथ फिर भी तुम्हें दे रही हूँ सनम
जबकि मालूम है कि डूबा दोगे तुम
जिंदगी ही बदल दी मेरी लाश में
जीते जी अब क्या जला दोगे तुम
राज़ मेरे फ़क़त जो तेरे पास है
अब ज़माने में उनको हवा दोगे तुम
गंगा जल की तरह प्यार बेदाग़ है
मुझ पे इल्ज़ाम कैसे लगा दोगे तुम।।


अजीत सतनाम कौर
जनवरी 2017

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