आँखे थी बंद चल रही थीं साँसे
धड़कता रहा मुझमें वो दिल तुम हो
जलाये ख़त मेरी यादों को किया दफ़न
मासूम नहीं हो मेरे क़ातिल तुम हो
धड़कता रहा मुझमें वो दिल तुम हो
जलाये ख़त मेरी यादों को किया दफ़न
मासूम नहीं हो मेरे क़ातिल तुम हो
माना ज़ीवन गर है भव सागर
राम कहें या अल्लाह,सबके साहिल तुम हो
तोड़े पूजा के घर,इंसानियत को कायम रखा
ख़ुदा तो नहीं हो पर पूजने के क़ाबिल तुम हो
राम कहें या अल्लाह,सबके साहिल तुम हो
तोड़े पूजा के घर,इंसानियत को कायम रखा
ख़ुदा तो नहीं हो पर पूजने के क़ाबिल तुम हो
'अस्क' शीशे के टूटा घर, पत्थरों की बौछार से
तेरी गवाही से लगा उस भीड़ में शामिल तुम हो।।
तेरी गवाही से लगा उस भीड़ में शामिल तुम हो।।
अजीत सतनाम कौर
फ़रवरी 2016
फ़रवरी 2016
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