ज़िंदगी मेरी जैसे भी बसर हो गई
आँख लगी भी ना थी कि सहर हो गई

इक पल भी ना मिला सकूँन का मुझे
रात काँटो पे जैसे बसर हो गई

संग ज़िंदगी के मैं ऐसे चलती रही
मैं वहीँ रही वो किधर हो गई

ऐसे देखा तूने मुझे बिछड़ते हुए
जब भी याद आया आँख मेरी तर हो गई

मैंने चोरी चोरी प्यार किया था तुझे
ज़माने को कैसे फिर ख़बर हो गई

रात ढलती रही आस बुझती रही
'अस्क' इसी उलझन में फिर सहर हो गई।।


अजीत सतनाम कौर
सितंबर  2015

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