कुछ मेरी भी शर्त
ज़िन्दगी से लगी थी
कुछ उसे भी ज़िद
मुझी से थी
उसकी कोशिश थी
मुस्कुराहट छिनने की
मुझे भी अनख थी
उससे जीतने की
सफ़र पूरा हुआ दौड़ का
मैं बाज़ी मार लूंगी
हँस कर उसे
अलविदा कहूँगी।।
मुवक्किल ना जी
सका कोई
काश और किन्तु में
बटती रही ज़िंदगी
रेत की तरह
फिसलता रहा वक़्त
यूँ तो रफ़्तार से
कटती रही ज़िंदगी।।
जैसे जैसे कटता गया
सफ़र ज़िंदगी का
एक अहसास पनपता रहा
मुझमें हक़ीक़ती का
जो गुनाह किए थे
शायद किसी जन्म में
तभी मेरी रूह को
ये कारगाह मिला होगा
कौन लिख सकता है
लेख किसी के
ऐसा होना दरग़ाह से ही
मिला होगा।।
काटती रही तां
उम्र ज़िंदगी को
कैद की तरहा
और पूछती रही
हर किसी से कि
मेरा गुनाह क्या है।।
चलो यूँही सही कि तुम
मुझे गिरा के चले तो सही
हरा के चले तो सही
आख़िर
मुस्कुरा के चले तो सही।।


अजीत सतनाम कौर
अगस्त 2014

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