तेरे आने से लाखों रौनकें हो गईं हैं माही
मेरे होने से तुझको क्या मिला मुझको बताना

उठा सैलाब सोये जज़्बातों का मुझमें
क्या तुझे भी ऐसा कुछ हुआ मुझको जताना

मेरी शोखियों अब अंगड़ाईयाँ ले रही हैं
दिन रात तेरी आग़ोश में हूँ
शुरू कर मुझे तू सताना

ग़ुमराह में कहीं खो रही थी
अब तेरे नाम से पहिचनेगा मुझको ज़माना

हर अल्फ़ाज़ मेरे सामने निचोड़ा है मैंने
सुगलता है तेरे सीने में, कियूँ मुझको कहा ना

नशा तेरा है रंग तेरा चढ़ा है
अब बेरंग लगता है मुझको मैखानां।।


अजीत सतनाम कौर
अक्टूबर 2018

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