लगा हालात को गले, ज़िंदगी ऐसे है गुज़ारी
विदेश की चकाचौंध देखी उन्होंने
मगर मैंने क़ीमत बड़ी दी है भारी

नहीं लेने देते सहारा उसे अब उस दीवार का
जो ईमारत उसने
पसीना बहा के है उसारी

कभी छीनना, कभी हक़ माँगना पड़ता
फ़ैला के आँचल कियूँ बनतीं है भिखारी

देश कब लौटना चाहें,परदेस छोड़ के
रोना रोए देश का,बड़ी है दुशवारी

परदेस में भी गाते गीत देश के
अपने देश में जीते, कियूँ ली ये जिंदगी उधारी

चाल चलता रहा ज़िंदगी के चलते
मौत के साथ ना चलनी ये
होशियारी

पैदल चला उम्र सारी, गरीबी को कोसता
चार कंधो की तुझे भी मिलेगी सवारी।।



अजीत सतनाम कौर
फ़रवरी 2016

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