औरत हूँ मैं तो ज़िन्दगी जंग ही होगी
आज़ाद है सभी आज़ाद देश में
मेरी आज़ादी दरवाजों बंद ही होगी

मंदिर मस्ज़िद में करो लाख सज़दा
बिन पूजे नारी, इबादत पाखण्ड ही होगी

दे दी उसे दहलीज़ ना लफ़्ज़ दिए उसको
क्या जीया,ज़िंदगी एक दण्ड ही होगी

पहना जिन्होंने धर्म और झूठ का चोला
आवाज़ उनकी बुलंद ही होगी

कब तक सहती तक चुप रहती
दबती रही ज़वाला तो प्रचण्ड ही होगी

महलों में रहने वाले अमीर है लगते
प्रेम दौलत में उनकी हालत नंग ही होगी

रोज़ रंग बदलते देखे  'अस्क' आज के आशिक़
इतने चड़े रंग तो तस्वीर बदरंग ही होगी।।


अजीत सतनाम कौर
फ़रवरी 2016

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