खोलता नहीं अपने लब
मुझसे शब्दों का प्यार माँगता है
ताकता है मासूमियत से
मगर इश्क़ तो इज़हार माँगता है।।


हर रोज़ सीखा है मैंने ज़िंदगी से
जोड़ देती हूँ कुछ सीखे पन्ने
ज़िंदगी की किताब से।।


गुल चमन में ए हसीं तुम सा अगर आबाद हो
ख़ुद गुलिस्तां और ख़ुद ही बागबां हो जाऊंगा।।


उम्र का सावन तो बेशक़ ही उतरने है लगा
ज़ुल्फ़ में तेरी हुआ तो फिर जवां हो जाऊंगा।।


अजीत सतनाम कौर
जनवरी 2018

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