ख़्वाब का रंग भी उड़ गया धूप में
अश्क़ को जब कभी हम सुखाने चले।।

सुना है इस दुनिया से कोई कुछ नहीं ले जाता
मगर मैं ले जाऊँगी कुछ राज़ साथ अपने।।

ठीक वैसे ही लग रहे हो तुम
जैसे ख़्वाबों में देखता था
क़ातिलाना ये अदा
चाल भी हिरनी जैसी।।

देख ले एक नज़र वक़्त ठहर जाएगा
ख़ुश हो कर कीजिये विदा
कहीं ना ये आख़िरी मुलाक़ात हो
मेरी चाहत मेरी हसरत है यही
तुझसे हर रोज़ यूँ ही बात हो।।

जब से देखा तुझे कोई मंज़र
ज़्यादा जंचती नही मुझे
मुझे भी क्या प्यार हुआ जो मेरे ख़्वाबों में भी ना था।।

गर मुहब्बत हो तो जता देना
दूर जाना भी हो तो बता देना
बुझने लगी है जो आग
अब उसे ना कभी हवा देना
दांव पे लगा दिया ख़ुद को
बाकि क्या है जो तुझे देना।।

अजीत सतनाम कौर
जनवरी 2018

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