मेरी ज़िंदगी में कितना अँधेरा है
तेरे दम से ही सवेरा है
मैं जो जिन्दा हूँ
फ़क़त तेरे लिए
मेरी हर सांस जो तेरा है
हो महल,झोपड़ी या कुटिया
तू जहाँ है वहीँ मेरा बसेरा है
ज़िंदगी की कडी धूप में साया तेरा
ये पेड़ किस क़दर घनेरा है
कियूँ ना जतलाऊँ
तुम पे हक़ अपना
तू मेरा है सिर्फ मेरा है।।
तेरे दम से ही सवेरा है
मैं जो जिन्दा हूँ
फ़क़त तेरे लिए
मेरी हर सांस जो तेरा है
हो महल,झोपड़ी या कुटिया
तू जहाँ है वहीँ मेरा बसेरा है
ज़िंदगी की कडी धूप में साया तेरा
ये पेड़ किस क़दर घनेरा है
कियूँ ना जतलाऊँ
तुम पे हक़ अपना
तू मेरा है सिर्फ मेरा है।।
अजीत सतनाम कौर
2015
2015
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