शिक़वा ये तेरा था मेरी आँखों से अश्क़ नहीं गिरा है
ढलका है तेरी पलकों से
हर आँसू वो मेरा है

चाहो शिद्दत से तो क़ायनात भी मिला देती है
ऐसा लिखा मैंने किताबों में पढ़ा है

किया था वादा तो लौट आऊँगा एक दिन
खो ना जाए तू भी
बस यही एक शुबा है

ज़िंदगी को तो जीत लूँगा यकीं है मुझकों
मौत की दस्तक़ से दिल थोड़ा डरा है

यकीं है तुझ पे मुहब्बतों की हदों तक
आख़िर वो मर्द है शक़ इसलिए ज़रा है

वादा किया था मैंने रात मिलने का
पकड़ के चाँद वो कई रातों से खड़ा है

हम दोनों जैसे दो किनारें हों दरिया के
इक किनारे से भला दूजा कब मिला है

वो और लोग थे जो इश्क़ पे परवान चढ़ गए
आज आशिक़ी में 'अस्क' कौन किस के लिए मरा है।।



अजीत सतनाम कौर
जुलाई 2015

Comments

Popular Posts