जिस रास्ते पर
खड़ी थी ज़िंदगी
मैं कतरा गई
उधर जाने से।।


कुछ रितु के पँछी
उड़े जिस हाल से
कुछ पँख झरे उनके
कुछ पत्ते गिरे डाल से
बस यादें बना के उनको
मैंने अब तक रखा है
सम्भाल के।।


जब ज़िन्दगी की तस्वीर में
हुए रंग कुछ कम से
शरू मैंने पूरा उन्हें करना
फ़िर किया क़लम से।।


धूम पर मचलता था जो
वो गीत थी ज़िंदगी
वक़्त ने ली करवट
धीमी सी ग़ज़ल बन गई
रंगों से खेलने को जो
थामा था ब्रश मैंने
वो मेरे हाथ की
अब क़लम बन गई।।


कभी रंगों को बिखेर कर
केनवास को
मैं कर देती थी रंगीन
अब क़लम और काली है शाही
फ़िर ख्वाबो में रंग
भरती हूँ हसींन।।


कुछ सौदा किया
ज़िन्दगी ने
मुझसे इस क़दर
हर शै से मुझे नवाज़ा
दिल खोल कर
बस
बदले में मुझसे
मेरी मुस्कुराहट ले कर।।

अजीत सतनाम कौर
नवम्बर 2014

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