तेरी ख़ामोशी बयां करने
हर रोज़ लफ्ज़ आते है
बेशक़ दूर तुझसे हूँ
पर तेरी चुप से वाकिफ़ हूँ।।

आते जाते ज़रा आवाज़ दिया कीजिए
बस्ती के बसे होने का एहसास रहता है

यूँ काट दी ज़िंदगी गुमनामियों में
सुकूँ दिल को वो पास रहता है

सावन बरसेगा अपने वक़्त पे
प्यासे दिलों को ये आस रहता है

ये धूप छावं कुदरत के करिश्में
यकीं हो तो करम ख़ुदा का ख़ास रहता है।।


अजीत सतनाम कौर
जनवरी 2017

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