अश्कों में मेरे आज भी लहू रिसता है
दिया था दर्द मुहब्बत ऐ दिल को
अभी भी हरा है ज़ख्म मुझे दिखता है

थमा कर मेरा हाथ सभी ने बेगाना कर दिया
छोड़ा तूने भी मगर बेगाना नहीं लगता है

बेशक़ जीया मैंने उसे ज़िंदगी मान कर
हक़ीक़त नहीं बस अफ़साना सा ही लगता है

तेरी आग़ोश देती है कड़ी धूप भी ठंडक मुझको
मौसम सावन का तेरे बग़ैर सुहाना नहीं लगता है

कहाँ होश में आने देता है कम्बख्त इश्क़ मुझको
मैखानां भी मुझे अब मैखानां नहीं लगता है

अब तो दर्द भी आते है मेरे पास सकूँन लेने
ज़ख्म 'अस्क' को और दे ज़माना नहीं लगता है।।


अजीत सतनाम कौर
सितंबर 2015

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