बेशक़ होती है मेरी कोख़ से हर उत्पत्ति
पर तेरी आग़ोश में होती है मेरी संपूर्ति।।

दूर बैठी देख रही थी
रेगिस्तान को
एहसास ऐसा था
जैसे जमीं छू रही है
आसमान को
या
आसमां आया था उतर जमीं पे
ये कैसा था मिलन,
ये कैसा था मंजर।।

ना था कोई जब सींचने वाला
बंजर होती जमीं को
रेगिस्तान में बदलते देखा मैंने
बाहों में भर के आसमां
तूने जमीं को उठा लिया
या झुक कर मुझे पे ही कहीं
ख़ुद को मुझमें समा लिया
मेरी हया का ख़्याल भी था तुझे
उठा कोहरे की चादर
सबसे मुझे छुपा लिया
दोनों के आग़ोश से
फ़िर कैसी आँधी चली
टकराती गर्म हवा
तेज़ सांसो सी
वादियों में बही
सन सनहट सी फ़िज़ा में
फ़ैल गई हर सूं कहीं
बादलों की गर्जना से
मूसला धार जो बरसा हुई
फ़िर मौसम ने मिज़ाज़
कुछ ऐसा बदला
धरती के माथे पे
ओस की बूंदों सा पसीना उभरा।।


अजीत सतनाम कौर
25 दिसम्बर 2015

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